Lord Shiva and his nineteen avatars : All you need to know

Vrishabh Avatar of Lord Shiva -

धर्म की रक्षा करने के लिए भगवान विष्णु ने अनेकों अवतार लिए, इसी के साथ भगवान शिव ने भी धर्म की रक्षा में भाग लेते हुए कई अवतार लिए. धर्म ग्रंथो में उल्लेख मिलता है कि भगवान शिव के 19वें अवतार वृषभ अवतार है, जो देवताओं की रक्षा करने के लिए जन्में थे.. जहाँ भगवान शिव ने कई अवतार दानवों का विनाश करने के लिए लिये थे वही वृषभ अवतार, विष्णु पुत्रों का संहार करने के लिए लिया था. आइए जानते है आखिर क्यों भगवान शिव को विष्णु पुत्रों का संहार करने की जरुरत पड़ी।

 

शिवजी के वृषभ अवतार की पौराणिक कथा

समुद्र मंथन के समय जब अमृत कलश उत्पन्न हुआ तो उसे दैत्यों की नजर से बचाने के लिए श्री हरि विष्णु ने अपनी माया से बहुत सारी अप्सराओं की उत्पत्ति की. दैत्य अप्सराओं को देखते ही उन पर मोहित हो गए और उन्हें जबरन उठाकर पाताल लोक ले गए, और वहां बंधी बना कर अमृत कलश को पाने के लिए वापिस आए तो समस्त देव अमृत का सेवन कर चुके थे।

 

जब दैत्यों को इस घटना का पता चला तो उन्होंने पुन: देवताओं पर युद्ध किया, लेकिन अमृत पीने से देवता अजर-अमर हो चुके थे, जिस कारण दैत्यों को हार का सामना करना पड़ा। दैत्यों ने स्वयं को सुरक्षित करने के लिए वह पाताल की ओर भागने लगे। दैत्यों के संहार के लिए हुए श्री हरि विष्णु उनके पीछे-पीछे पाताल लोक जा पहुंचे और वहां समस्त दैत्यों का विनाश कर दिया।

 

दैत्यों का नाश होते ही अप्सराएं मुक्त हो गई, जब उन्होंने मनमोहिनी मूर्त वाले श्री हरि विष्णु को देखा तो वे उन पर मोहित हो गई और उन्होंने भगवान शिव से श्री हरि विष्णु को उनका स्वामी बन जाने का वरदान मांगा। अपने भक्तों की इच्छा पूरी करने के लिए भगवान शिव सदैव तत्पर रहते हैं, उन्होंने अपनी माया से श्री हरि विष्णु को अपने सभी धर्मों व कर्तव्यों को भूल अप्सराओं के साथ पाताल लोक में रहने के लिए कहा। श्री हरि विष्णु पाताल लोक में निवास करने लगे। उन्हें अप्सराओं से कुछ पुत्रों की प्राप्ति भी हुई लेकिन वह पुत्र राक्षसी प्रवृति के थे। उन्होनें अपनी क्रूरता से तीनों लोकों में कोहराम मचा दिया। उनके अत्याचारों से परेशान होकर सभी देवतागण भगवान शिव के समक्ष गए व उनसे श्री हरि विष्णु के पुत्रों का संहार करने की प्रार्थना की।

 

देवताओं को विष्णु पुत्रों के आतंक से मुक्त करवाने के लिए भगवान शिव एक बैल यानि कि ‘वृषभ’ के रूप में पाताल लोक पहुंचे और वहां जाकर भगवान विष्णु के सभी पुत्रों का संहार कर डाला, ये देख श्री हरि विष्णु क्रोधित हो उठे और भगवान शिव रूपी वृषभ पर आक्रमण कर दिया लेकिन उनके सभी वार निष्फल हो गए।

 

मान्यता है कि शिव व विष्णु, दिव्य रूप है, इसलिए बहुत समय तक युद्ध चलने के बाद भी दोनों में से किसी को भी न तो हानि हुई और न ही कोई लाभ। अंत में जिन अप्सराओं ने श्री हरि विष्णु को अपने वरदान में बांध रखा था उन्होंने उन्हें मुक्त कर दिया.. इसके बाद जब श्री हरि विष्णु को इस घटना का बोध हुआ तो उन्होंने भगवान शिव की स्तुति की।

 

भगवान शिव के कहने पर श्री हरि विष्णु विष्णुलोक लौट गए.. भगवान विष्णु पाताल लोक से जाने से पहले अपना सुदर्शन चक्र वहीं छोड़ गए, जिसके बाद विष्णुलोक में भगवान विष्णु ने शिव की स्तुति कर उनके एक और सुदर्शन चक्र की प्राप्ति की.

Utpanna Ekadashi 2022 Vrat Date, puja timing and significance

उत्पन्ना एकादशी 2022 -

सनातन धर्म में आस्था रखने वाले लोग एकादशी व्रत को खास महत्व देते हैं.. एकादशी व्रत का पालन कर भगवान विष्णु जी की पूजा की जाती है.. मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को उत्पन्ना एकादशी के नाम से जाना जाता है.. साल 2022 में उत्पन्ना एकादशी 20 नवंबर, दिन रविवार को पड़ रही है.. एकादशी का व्रत बेहद पवित्र और खास होता है, इसलिए इस व्रत के नियम का विशेष ध्यान रखा जाता है.. आइए जानते हैं कि उत्पन्ना एकादशी का व्रत कब रखा जाएगा और इसके लिए शुभ मुहूर्त, पूजा विधि क्या है?

 

उत्पन्ना एकादशी 2022 तिथि और शुभ मुहूर्त

 

उत्पन्ना एकादशी 20 नवंबर 2022, दिन रविवार

 

एकादशी तिथि आरंभ – 19 नवम्बर को प्रात: 10 बजकर 29 मिनटे से आरंभ

 

एकादशी तिथि समाप्त – 20 नवम्बर को प्रात: 10 बजकर 41 मिनट तक

 

21 नवंबर को पारण का समय – प्रात: 06 बजकर 48 मिनट से 08 बजकर 56 मिनट तक

 

उत्पन्ना एकादशी पारण

उत्पन्ना एकादशी व्रत का पारण 21 नवंबर, 2022 को किया जाएगा. एकादशी के व्रत का समापन पारण कहलाता है.. एकादशी व्रत के अगले दिन सूर्योदय के बाद पारण किया जाता है. एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना जरूरी होता है. यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पहले समाप्त हो गयी हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के बाद ही होता है.

 

उत्पन्ना एकादशी व्रत नियम

एकादशी का व्रत कठिन व्रतों में से एक है. मान्यता है कि एकादशी का व्रत दशमी तिथि की शाम सूर्यास्त के बाद से ही शुरु हो जाता है. वहीं एकादशी व्रत का समापन द्वादशी तिथि पर किया जाता है, इसलिए उत्पन्ना एकादशी के व्रत के दौरान व्रत नियम का ध्यान रखना बेहद जरूरी है. ऐसे में व्रती दशमी तिथि पर सूर्यास्त से पहले भोजन कर लें. इस दिन तामसिक भोजन से परहेज करें और सात्विक और हल्का आहार लें.

 

उत्पन्ना एकादशी व्रत विधि

उत्पन्ना एकादशी व्रत के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि करके व्रत का संकल्प लें. 

 

इसके बाद मंदिर में भगवान विष्णु जी के सामने घी का दीपक जलाएं. फल-फूल आदि से पूजन करें.

 

उत्पन्ना एकादशी पर पूरे दिन उपवास रखकर श्रीहरि का ध्यान करें. एकादशी व्रत के दौरान दिन में सोना नहीं चाहिए.

 

द्वादशी तिथि को सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद फिर से पूजन करें.  

गरीबों को भोजन कराएं और दान-दक्षिणा देकर विदा करें. इसके बाद ही एकादशी व्रत का पारण करें.

Vastu Tips For Temple

Vastu Tips For Temple -

हिंदू धर्म में पूजा-पाठ का विशेष महत्व होता है. लगभग हर घर में रोजाना सुबह और शाम के समय में पूजा की जाती है. इससे घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है, लेकिन कई बार रोजाना पूजा-पाठ करने के बावजूद भी घर में अशांति रहती है और शुभ फल की प्राप्ति भी नहीं होती. इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं. वास्तु के अनुसार, अधिकतर लोग पूजा-पाठ करते समय कई तरह की गलतियां करते हैं.

 

वास्तु के अनुसार

वास्तु शास्त्र में कई ऐसी चीजों के बारे में बताया गया है जिससे किसी भी व्यक्ति का जीवन सफल हो सकता है. वास्तु में कुछ गलतियों का भी जिक्र किया गया है जिसे करने से व्यक्ति के जीवन में मुसीबतें बढ़ सकती हैं. वास्तु में पूजा-पाठ के कुछ नियमों के बारे में भी बताया गया है. बहुत से लोग पूजा-पाठ के दौरान जाने-अंजाने में कई गलतियां कर देते हैं जिससे देवी-देवता आपसे नाराज भी हो सकते हैं. ये गलतियां आपके व्यक्तिगत जीवन और घर की सुख-शांति पर असर डालती हैं. ऐसे में आज हम आपको मंदिर और पूजा-पाठ से जुड़ी ऐसी गलतियों के बारे में बताने जा रहे हैं जो अशांति और सुख-समृद्धि की हानि का कारण बन सकती हैं. आइए जानते हैं उनके बारे में- 

 

जमीन पर ना रखें शिवलिंग

शिवलिंग भगवान भोलेनाथ का प्रतीक है. माना जाता है कि भोलेनाथ में इस पूरे ब्रह्मांड की ऊर्जा समाहित है. ऐसे में शिवलिंग को भूलकर भी जमीन पर नहीं रखना चाहिए. ऐसा करने से घर में नकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है. शिवलिंग को हमेशा पूजास्थल में साफ जगह पर रखना चाहिए. 

 

यहां ना रखें दीया

पूजा करते समय दीया जरूर जलाया जाता है. ऐसा करना काफी शुभ माना जाता है. ऐसे में दीपक को कभी भी जमीन पर नहीं रखना चाहिए. दीपक को हमेशा थाली में किसी स्टैंड पर रखना चाहिए. 

 

शालिग्राम को ना रखें जमीन पर

हिंदू धर्म में शालिग्राम को बेहद पूजनीय माना गया है. शालिग्राम का प्रयोग भगवान का आह्वान करने के लिए किया जाता है. शिव भक्त पूजा करने के लिए शिवलिंग के रूप में शालिग्राम का इस्तेमाल करते हैं. भगवान विष्णु की पूजा में भी शालिग्राम का खास महत्व होता है. जिस घर में भी शालिग्राम स्थापित किया जाता है वहां सुख और समृद्धि अपने आप ही आने लगती है, लेकिन इसे जमीन पर रखने से आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है. कभी भी शालिग्राम को जमीन पर नहीं रखना चाहिए. 

 

मूर्ति को जमीन पर ना रखें

मंदिर की साफ-सफाई करते समय अधिकतर लोग मूर्ति समेत सभी चीजों को जमीन पर रख देते हैं फिर सफाई करते हैं. आपको बता दें कि ऐसा बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए. मंदिर की सफाई करते समय मूर्ति को कभी भी जमीन पर नहीं रखना चाहिए. ऐसा करने से भगवान का अपमान होता है और आपके घर की शांति भंग हो सकती हैं. मंदिर की साफ-सफाई करते समय मूर्तियों को हमेशा किसी कपड़े या थाली में रखें. 

 

शंख का पूजा-पाठ में कितना महत्व

हिंदू धर्म में शंख का विशेष महत्व होता है. धार्मिक अवसरों पर शंख बजाना काफी शुभ माना जाता है. ऐसा माना जाता है कि जिस घर के पूजा स्थल में शंख रहता है और प्रतिदिन बजाया जाता है, वहां पर मां लक्ष्मी का वास बना रहता है. साथ ही यह भी माना जाता है कि शंख की मंगल ध्वनि से नकारात्मक उर्जा दूर हो जाती है. माता लक्ष्मी की पूजा शंख के बिना अधूरी मानी जाती है. ऐसे में इसे जमीन पर रखने से नकारात्मक प्रभाव पड़ता है और धन की हानि भी होती है. 

 

सोने के गहने पर रखें सावधानी

आपको बता दें कि सोने के गहने मां लक्ष्मी का रूप माने जाते हैं जो भगवान विष्णु को अति प्रिय होते हैं. ऐसे में सोने के गहनों को भूलकर भी जमीन पर नहीं रखना चाहिए इससे देवी-देवताओं का अपमान माना जाता है. साथ ही पैरों में भी कभी सोने के आभूषण नहीं पहनने चाहिए. यह शुभ नहीं माना जाता है. सोने के गहनों को हमेशा किसी कपड़े में लपेटकर रखना चाहिए.

The Story Of Mahakaleshwar Ujjain

Mahakaleshwar Ujjain -

मध्यप्रदेश के उज्जयिनी के श्री महाकालेश्वर भारत में बारह प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंगों में से एक हैं.. महाकालेश्वर मंदिर की महिमा का विभिन्न पुराणों में विशद वर्णन किया गया है.. कालिदास से शुरू करते हुए, कई संस्कृत कवियों ने इस मंदिर को भावनात्मक रूप से समृद्ध किया है.. उज्जैन भारतीय समय की गणना के लिए केंद्रीय बिंदु हुआ करता था और महाकाल को उज्जैन का विशिष्ट पीठासीन देवता माना जाता था.. समय के देवता, शिव अपने सभी वैभव में, उज्जैन में शाश्वत शासन करते हैं। महाकालेश्वर का मंदिर, इसका शिखर आसमान में चढ़ता है, आकाश के खिलाफ एक भव्य अग्रभाग, अपनी भव्यता के साथ आदिकालीन विस्मय और श्रद्धा को उजागर करता है.. भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक, महाकाल में लिंगम (स्वयं से पैदा हुआ), स्वयं के भीतर से शक्ति को प्राप्त करने के लिए माना जाता है.. महाकालेश्वर की मूर्ति दक्षिणमुखी होने के कारण दक्षिणामूर्ति मानी जाती है.. यह एक अनूठी विशेषता है, जिसे तांत्रिक परंपरा द्वारा केवल 12 ज्योतिर्लिंगों में से महाकालेश्वर में पाया जाता है.. महाकाल मंदिर के ऊपर गर्भगृह में ओंकारेश्वर शिव की मूर्ति प्रतिष्ठित है.. गर्भगृह के पश्चिम, उत्तर और पूर्व में गणेश, पार्वती और कार्तिकेय जी के चित्र स्थापित हैं.. दक्षिण में नंदी की प्रतिमा है, तीसरी मंजिल पर नागचंद्रेश्वर की मूर्ति केवल नागपंचमी के दिन दर्शन के लिए खुली होती है.. महाशिवरात्रि के दिन, मंदिर के पास एक विशाल मेला लगता है, और रात में पूजा होती है।

 

महाकाल मंदिर के विशेष उत्सव एवं पर्व

 

यूं तो महाकाल मंदिर में वर्षभर उत्सव का ही माहौल रहता है, लेकिन विशेष अवसरों पर यहां विशेष उत्सवों का आयोजन होता है.. श्रावण मास के प्रत्येक सोमवार को राजाधिराज महाकाल की विशेष सवारी निकलती है, जब महाकालेश्वर नगर भ्रमण कर नगरवासियों को दर्शन देते है.. वैकुंठ चतुर्दशी पर हरिहर मिलन सवारी यानि हरि विष्णु और हर शिव का मिलन होता है.. फाल्गुन कृष्ण पंचमी या षष्ठी से महाशिव रात्रि तक शिव नवरात्रि के दौरान भगवान शिव का विशेष श्रृंगार किया जाता है.. महाशिवरात्रि के दिन विशेष उत्सव होते हैं.

 

महाकाल मंदिर परिसर में स्थित अन्य मंदिर

 

महाकालेश्वर मंमिदर परिसर में और भी ऐसे मंदिर तथा देव प्रतिमाएं हैं, जो श्रद्धालुओं की आस्था का केन्द्र हैं.. इनमें लक्ष्मी-नृसिंह मंदिर, ऋद्धि-सिद्धि गणेश, विट्ठल पंढरीनाथ मंदिर, श्रीराम दरबार मंदिर, अवंतिका देवी, चंद्रादित्येश्र्वर, मंगलनाथ, अन्नपूर्णादेवी, वाच्छायन गण्पति, औंकारेश्वर महादेव, नागचंद्रेश्वर महादेव, नागचंद्रेश्वर महादेव, त्रिविष्टापेश्वर महादेव, मां भद्रकाली मंदिर, नवग्रह मंदिर, मारुतिनंदन हनुमान, कोटितीर्थ कुंड, श्रीराम मंदिर, नीलकंठेश्वर महादेव, गोविंदेश्वर महादेव, सूर्यमुखी हनुमान, लक्ष्मीप्रदाता मोढ़ गणेश मंदिर, स्वर्णजालेश्वर महादेव, शनि मंदिर, कोटेश्वर महादेव, अनादिकल्पेश्वर महादेव, चंद्र-आदित्येश्र्वर महादेव, वृद्धकालेश्वर महादेव, सप्तऋषि मंदिर, श्री बालविजय मस्त हनुमान आदि प्रमुख है.

 

कुंड में नहाने से दूर होते हैं पाप

 

मंदिर के पास एक कुंड है, ऐसा माना जाता है की इसमें नहाने से सभी पाप धुल जाते हैं.. मान्यताओं के मुताबित उज्जैन महाकाल के प्रकट होने से जुड़ी एक कथा है, जिसमें दूषण नामक असुर से प्रांत के लोगों की रक्षा के लिए महाकाल यहां प्रकट हुए थे, फिर जब दूषण का वध करने के बाद भक्तों ने शिवजी से उज्जैन में ही रहने की प्रार्थना की तो भगवान शिव महाकाल ज्योतिर्लिंगों के रूप में प्रकट हुए.

 

सिर्फ महाकाल में देखने मिलती है भस्म आरती

 

उज्जैन को प्राचीनकाल से धार्मिक नगरी कहा गया है.. आज भी यहां दूर दूर से लोग दर्शन करने के लिए आते हैं.. भगवान महाकाल की भस्म आरती के दुर्लभ पलों को देखने का अवसर आपको यहां ही मिलेगा.. माना जाता है कि इस आरती को देखने मात्र से ही लोगों के कष्ट दीर होते हैं, इसके बिना आपके दर्शन पूरे भी नहीं होते हैं.

 

क्या है भस्म आरती?

 

भस्म को सृष्टि का सार माना जाता है, ऐसे में भगवान शिव इसे हमेशा धारण किए रहते हैं.. हर सुबह महाकाल की भस्म आरती से श्रृंगार किया जाता है और उन्हें जगाया जाता है.. सालों पहले की बात करें तो शमशान से भस्म लाने की परंपरा थी, हालांकि पिछले कुछ सालों में अब कपिला गाय के गोबर से बने कंडे, शमी, पीपल, पलाश, बड़, अमलतास और बेर की लकड़ियों को जलाकर भस्म को तैयार किया जाता है, फिर इसे कपड़े से छानने के बाद इस्तेमाल किया जाता है.. भस्म आरती के पीछे मान्यता है कि भगवान शिव श्मान के साधक हैं, इस कारण से भस्म को उनका श्रृंगार माना जाता है.. इसी के साथ कहते हैं कि ज्योतिर्लिंग पर चढ़े भस्म का प्रसाद खाने से रोग दोष से मुक्ति मिलती है.

 

क्या हैं नियम?

 

नियमों के मुताबिक, महिलाओं को आरती के समय घूंघट करना होता है, क्योंकि महिलाएं इस आरती को नहीं देख सकती हैं, इसके अलावा आरती के दौरान पुजारी भी मात्र एक धोती में आरती करते हैं.. दूसरे किसी भी तरह के कपड़ों को पहनने की मनाही है.

 

कैसे पहुंचे उज्जैन महाकालेश्वर?

 

महाकाल दर्शन के लिए आपके पास तीन यातायात हैं। इन साधनों से आप उज्जैन पहुंच सकते हैं।

 

ट्रेन- उज्जैन सभी बड़े शहरों के रेलमार्ग से जुड़ा है। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता जैसे शहरों से यहां के लिए सीधी ट्रेन है।

 

एयरप्लेन- उज्जैन में एयरपोर्ट नहीं है लेकिन इसके सबसे नजदीकी एयरपोर्ट की बात करें तो इंदौर है। इंदौर से उज्जैन करीब 58 किलोमीटर है। एयरपोर्ट से उतरते ही आपको टैक्सी या बस मिलेंगी। यहां से महाकालेश्वर पहुंचने के लिए करीब 1 से 1.15 घंटे लगेंगे।

 

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की पौराणिक कथा

 

अवंती नाम से एक रमणीय नगरी हुआ करती थी, जो भगवान शिव को बहुत प्रिय थी.. इसी नगर में एक ज्ञानी ब्राह्मण रहते थे, जो बहुत ही बुद्धिमान और कर्मकांडी ब्राह्मण थे.. साथ ही ब्राह्मण शिव के बहुत बड़े भक्त थे.. वह हर रोज पार्थिव शिवलिंग बनाकर उसकी आराधना किया करते थे.. ब्राह्मण का नाम वेद प्रिय था, जो हमेशा वेद के ज्ञान अर्जित करने में लगे रहते थे.. ब्राह्मण को उनके कर्मों का पूरा फल प्राप्त हुआ था.

 

तो वहीं दूसरी ओर रत्नमाल पर्वत पर दूषण नामक राक्षस रहता था.. इस राक्षस को ब्रह्मा जी से एक वरदान प्राप्त था, इसी वरदान के मद में वह धार्मिक व्यक्तियों पर आक्रमण किया करता था.. उसने उज्जैन के ब्राह्मणों पर आक्रमण करने का विचार बना लिया, इसी वजह से उसने अवंती नगर के ब्राह्मणों को अपनी दुष्टता से परेशान करना शुरू कर दिया.. राक्षस ब्राह्मणों को कर्मकांड करने से रोकने लगा.. राक्षस चाहता था कि सभी ब्राह्मण धर्म-कर्म का कार्य करे, लेकिन ब्राह्मणों ने उसकी इस बात को अंदेखा किया.. इसके बाद राक्षसों द्वारा उन्हें आए दिन परेशान किया जाने लगा.. राक्षसों से परेशान होकर ब्राह्मणों ने शिव शंकर से अपने रक्षा के लिए प्रार्थना की.

 

ब्राह्मणों के विनय पर भगवान शिव ने राक्षस के अत्याचार को रोकने से पहले उन्हें चेतावनी दी..  भगवान शिव की बात ना मान कर राक्षसों ने ब्राह्मणों पर हमला कर दिया.. भगवान शिव धरती फाड़कर महाकाल के रूप में प्रकट हुए.. नाराज शिव ने अपनी एक हुंकार से ही दूषण राक्षस को भस्म कर दिया और राक्षसों के अत्याचार से मुक्ति दिलाई.. भक्तों की इच्छा थी, कि भगवान शिव उसी रूप में वहीं बस जाएं.. इस मांग से अभीभूत होकर भगवान वहां विराजमान हो गए.. इसी वजह से इस जगह का नाम महाकालेश्वर पड़ा, जिसे आप महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के नाम से जानते हैं.

Date, Time, Significance, Kaal Bhairav Jayanti 2022

श्री काल भैरव जयंती 2022 -

देवों के देव भगवान शंकर ने भी धरती पर अनेकों अवतार लिए, जिसमें से एक अवतार उनका रौद्र रूप है जिसे काल भैरव के नाम से जाना जाता है. वैसे तो हर माह कालाष्टमी आती है लेकिन कहते हैं कि मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को शिव ने काल भैरव का रूप धारण किया जिसे काल भैरव के नाम से जाना जाता है.. कहते है कि शत्रु और ग्रह बाधा दूर करने के लिए काल भैरव की पूजा बहुत उत्तम मानी गई है. आइए जानते हैं काल भैरव जंयती की तिथि, पूजा मुहूर्त और महत्व.

 

काल भैरव जयंती तिथि

काल भैरव जयंती साल 2022 में 16 नवंबर, दिन बुधवार  को मनाई जाएगी. इस दिन शिव के रौद्र रूप का पूजन करने से अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति मिलती है और तमाम रोग, दोष दूर होते हैं. जीवन में कभी बुरी शक्तियां हावी नहीं होती.

 

काल भैरव जयंती मुहूर्त  

सनातन पंचांग के अनुसार काल भैरव जयंती मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि, 16 नवंबर 2022, प्रात: 05 बजकर 49 से शुरू होगी. अष्टमी तिथि समाप्त 17 नवंबर 2022 को सुबह 07 बजकर 57 पर होगी.

 

ब्रह्म मुहूर्त – 05 बजकर 02 मिनट से 05 बजकर 54 मिनट

 

अमृत काल मुहूर्त – 05 बजकर 12 मिनट से 06 बजकर 59 मिनट

 

निशिता काल मुहूर्त – 16 नवंबर, दिन बुधवार, रात 11 बजकर 45 मिनट से 17 नवंबर, दिन गुरूवार, प्रात: 12 बजकर 38 मिनट तक

 

काल भैरव पूजा महत्व

काल भैरव जयंती पर महादेव के रौद्र रूप की पूजा से भौतिक सुखों की प्राप्ति होती है. भैरव शब्द का अर्थ है रक्षा करने वाला, इन्हें दंडपाणि की उपाधि भी दी गई है. कहते हैं अच्छे कर्म करने वालों पर काल भैरव मेहरबान रहते हैं लेकिन जो अनैतिक कार्य करता है, तो काल भैरव के प्रकोप से बच भी नहीं पाता. काल भैरव का वाहन कुत्ता माना गया है. मान्यता है कि काल भैरव को प्रसन्न करना है तो काल भैरव जयंती के दिन विशेषकर काले कुत्ते को भोजन खिलाना चाहिए. इससे आकस्मिक संकटों से काल भैरव रक्षा करते हैं. वहीं जो इस दिन मध्यरात्रि में चौमुखी दीपक लगाकर भैरव चालीसा का पाठ करता है उसके जीवन में शनि और राहु के अशुभ प्रभाव कम हो जाते हैं.

What is the story of Omkareshwar temple?

Omkareshwar Temple -

भगवान शिव के प्रसिद्ध 12 ज्योतिर्लिंगों मंदिरों में चौथे स्थान पर पूजे जाने वाला ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर, मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में स्थित है.. यह मंदिर नर्मदा नदी के किनारे मन्धाता या शिवपुरी नामक ओम के आकार में बने प्राकृतिक टापू पर है. पुराणों में इस टापू को ओमकार पर्वत पर कहा गया है.

 

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग की एक सबसे अनोखी बात यह है कि यह दो ज्योतिस्वरूप शिवलिंगों में विभक्त है, यानी दो अलग-अलग ज्योतिर्लिंगों में स्थापित है, इसलिए इनके मंदिर भी अलग-अलग हैं.. इनके नाम हैं ओमकारेश्वर और ममलेश्वर हैं.. इन दोनों मंदिरों में दर्शन करने पर ही एक ज्योतिर्लिंग की यात्रा पूरी मानी जाती है.. इसमें से एक श्री ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग नर्मदा के उत्तरी तट के टापू पर है जबकि श्री ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर नर्मदा के दक्षिणी तट पर टापू से बाहर स्थित है.

 

नर्मदा के दक्षिणी तट पर स्थित श्री ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग को पुराणों में अमलेश्वर या विमलेश्वर के नाम से जाना जाता है.. नियमों और मान्यताओं के अनुसार पहले ओंकारेश्वर का दर्शन करके लौटते समय अमलेश्वर-दर्शन किया जाना चाहिए, लेकिन यात्री चाहे तो सुविधा के अनुसार पहले अमलेश्वर का दर्शन कर सकते हैं और तब नर्मदा पार करके ओमकारेश्वर जा सकते हैं.. इसमें से नर्मदा नदी के टापू पर स्थित भगवान ओमकारेश्वर को स्वयंभू ज्योतिर्लिंग माना जाता है.. ओमकारेश्वर के नाम के विषय में भी माना जाता है कि ओम के आकार वाले पर्वत पर होने के कारण इसे ओमकारेश्वर नाम दिया गया.. धर्मग्रंथों में बताया गया है कि ओमकारेश्वर और अमलेश्वर ज्योतिस्वरूप शिवलिंगों में 68 तीर्थों के देवी-देवता परिवार सहित निवास करते हैं.

 

ओम के आकार में बने इस प्राकृतिक टापू को ओमकारेश्वर तीर्थ नगरी या ओमकार-मान्धाता के नाम पर भी पहचाना जाता है.. ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शनों के लिए आने वाले सर्व-साधारण भक्तों और श्रद्धालुओं को इस बात की जानकारी नहीं होने के अभाव में किसी एक ही मंदिर में दर्शन करके लौट जाते हैं जिसकी वजह से उनकी इस ज्योतिर्लिंग की यात्रा अधूरी ही रह जाती है.. शिवपुराण में इस ज्योतिर्लिंग की महिमा का विस्तार से वर्णन किया गया है, इसके अलावा श्री ओंकारेश्वर और श्री ममलेश्वर के दर्शन से पहले नर्मदा-स्नान के पावन फल का वर्णन भी विस्तार से किया गया है.

 

यहां दो ज्योतिस्वरूप शिवलिंग ओमकारेश्वर और ममलेश्वर शिवलिंगों को लेकर मान्यता है कि एक बार नारद मुनि विंध्य पर्वत पर पहुँचे, विंध्य पर्वत ने बड़े आदर-सम्मान के साथ नारद जी का स्वागत किया और कहा कि मैं सर्वगुण सम्पन्न हूं, मेरे पास हर प्रकार की सम्पदा है, किसी प्रकार की कोई कमी नहीं है.. विंध्य पर्वत के अहंकार को देखकर नारद जी ने उनके अहंकार का नाश करने की सोची.. नारद जी ने विंध्य पर्वत को बताया कि तुम्हारे पास सब कुछ है, लेकिन मेरू पर्वत तुमसे बहुत ऊँचा है और उसके शिखर देवताओं के लोकों तक पहुंचे हैं और मुझे लगता है कि तुम्हारे शिखर वहां तक कभी नहीं पहुंच पाएगा.. नारद जी की बात सुनकर विन्ध्याचल को अपनी गलती का एहसास हुआ.

 

श्री ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग नर्मदा के उत्तरी तट के टापू पर है जबकि श्री ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर नर्मदा के दक्षिणी तट पर टापू से बाहर स्थित है.. विंध्य पर्वत ने उसी समय निर्णय किया कि अब वह भगवान शिव की आराधना और तपस्या करेगा.. इसके बाद उसने नर्मदा नदी के किनारे जहां आज ममलेश्वर शिवलिंग स्थापित है उस स्थान पर मिट्टी का शिवलिंग बनाकर भगवान शिव की कठोर तपस्या शुरू की.. कई वर्षों की कठोर तपस्या के बाद भगवान शिव उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर विंध्य पर्वत को साक्षात दर्शन दिया.

 

भगवान शिव ने विंध्य पर्वत से वर मांगने के लिए कहा, जिसके बाद विन्ध्याचल पर्वत ने कहा कि भगवन यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो कृपया मुझे कार्य की सिद्धि करने वाली अभीष्ट बुद्धि प्रदान करें और शिवलिंग के रूप में सदा-सदा के लिए यहां विराजमान हो जायें.

 

विन्ध्यपर्वत की याचना को पूरा करते हुए भगवान शिव ने वरदान दिया, उसी समय देवतागण तथा कुछ ऋषिगण भी वहाँ आ गये.. देवताओं और ऋषियों के विशेष अनुरोध पर वहाँ स्थित ज्योतिर्लिंग दो स्वरूपों में विभक्त हो गया, जिसमें से एक प्रणव लिंग ओंकारेश्वर और दूसरा पार्थिव लिंग ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग के नाम से प्रसिद्ध हुए.

 

यदि पौराणिक और पारंपरिक तरीके से ओमकारेश्वर ज्योतिर्लिंग की यात्रा की जाये तो यह यात्रा मूलतः तीन दिन की मानी जाती है.. नर्मदा के दक्षिणी तट पर जो बस्ती है उसे विष्णुपुरी के नाम से जाना जाता है, जबकि ओमकारेश्वर नगरी का मूल और पौराणिक नाम ‘मान्धाता‘ ही है.. पुराणों के अनुसार सूर्यवंशी राजा मान्धाता ने यहाँ नर्मदा किनारे इस ओम पर्वत पर घोर तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया और शिवजी के प्रकट होने पर उनसे यहीं ओमकार पर्वत पर निवास करने का वरदान माँग लिया, इसीलिए उस महान राजा मान्धाता के नाम पर ही इस पर्वत का नाम मान्धाता पर्वत हो गया और यह प्रसिद्ध तीर्थ नगरी ओमकार-मान्धाता के रूप में पुकारी जाने लगी.

 

चौसर-पांसे खेलने आते हैं शिव-पार्वती

 

ऐसी मान्यता है कि रोज रात में भगवान शिव और माता पार्वती इस मंदिर में आते है और यहां चौसर-पांसे खेलते हैं.. यही कारण है कि रात में मंदिर के गर्भगृह में ज्योतिर्लिंग के सामने रोज चौसर-पांसे की बिसात सजाई जाती है.. ये परंपरा मंदिर की स्थापना के समय से ही चली आ रही है.. कई बार ऐसा हुआ है कि चौसर और पांसे रात में रखे स्थान से हटकर सुबह दूसरी जगह मिलते है.. ओंकारेश्वर शिव भगवान का अकेला ऐसा मंदिर है जहां रोज गुप्त आरती होती है.. इस दौरान पुजारियों के अलावा कोई भी गर्भगृह में नहीं जा सकता.. इसकी शुरुआत रात 8:30 बजे रुद्राभिषेक से होती है.. अभिषेक के बाद पुजारी पट बंद कर शयन आरती करते हैं.. आरती के बाद पट खोले जाते हैं और चौसर-पांसे सजाकर फिर से पट बंद कर देते हैं.. साल में एक बार शिवरात्री के दिन चौसर पांसे की पूरी बिसात बदल दी जाती है, इस दिन भगवान के लिए नए चौसर-पांसे लाए जाते हैं.

7 Unsolved and Hidden Mysteries of Lord Shiva

Hidden Mysteries of Lord Shiva -

 

  1. शिव की कितनी पत्नियां थी?

भगवान शंकर का विवाह सर्वप्रथम प्रजापति दक्ष की पुत्री सती से हुआ फिर जब वे यज्ञकुंड में कूदकर भस्म हो गई, तब उन्होनें दूसरा जन्म लिया और हिमवान की पुत्री पार्वती कहलाई. कहते है कि गंगा, काली और उमा भी शिव की पत्नियां थीं, लेकिन वास्तव में शिव के साथ पार्वती का ही नाम लिया जाता है.

 

  1. कितने हैं शिव के पुत्र?

भगवान शिव ने पार्वती से विवाह करने के बाद कार्तिकेय नाम का एक पुत्र प्राप्त किया. भगवान गणेश तो माता पार्वती के उबटन से बने थे. सुकेश नामक एक अनाथ बालक को शिव-पार्वती ने पाला था. जलंधर शिव के तेज से उत्पन्न हुआ था. अय्यप्पा शिव और मोहिनी के संयोग से जन्मे थे. भूमा उनके ललाट के पसीने की बूंद से जन्मे थे. अंधक और खुजा नामक 2 पुत्र और थे जिसके बारे में ज्यादा उल्लेख नहीं मिलता है. शिव पुराण में भगवान शिव के परिवार का पूर्ण रुप से और विस्तार में उल्लेख मिलता है.

 

  1. शिव के कितने शिष्य?

शिव के प्रमुख 7 शिष्य है जिन्हें प्रारंभिक सप्तऋषि माना गया है. इन ऋषियों ने ही शिव के ज्ञान को संपूर्ण धरती पर प्रचारित किया जिसके चलते भिन्न-भिन्न धर्म और संस्कृतियों की उत्पत्ति हुई. शिव ने ही गुरू और शिष्य परंपरा की शुरुआत की थी. शिव के शिष्य हैं- बृहस्पति, विशालाक्ष, शुक्र, सहस्त्राक्ष, महेंद्र, प्राचेतस मनु, भरद्वाज इसके अलावा 8वें गौरशिरस मुनि भी थे. शिव के शिष्यों में वशिष्ठ और अगस्त्य मुनि का नाम भी लिया जाता है.

 

  1. क्या शिव ही बुद्ध थे?

बौद्ध साहित्य के मर्मज्ञ अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त विद्वान प्रोफेसर उपासक का मानना है कि शंकर ने ही बुद्ध के रूप में जन्म लिया था. उन्होनें पालि ग्रंथों में वर्णित 27 बुद्धों को उल्लेख करते हुए बताया कि इनमें बुद्ध के 3 नाम अतिप्राचीन हैं- तणंकर, शणंकर और मेघंकर.

 

  1. क्या शिव और शंकर एक ही हैं?

कई पुराणों के अनुसार भगवान शंकर को शिव इसलिए कहते हैं कि वे निराकार शिव के समान हैं. निराकार शिव को शिवलिंग के रूप में पूजा जाता है. कई लोग शिव और शंकर को एक ही सत्ता के 2 नाम बताते हैं. असल में दोनों की प्रतिमाएं अलग-अलग आकृति की हैं. शंकर को हमेशा तपस्वी रुप में दिखाया जाता है, कई जगह तो शंकर तो शिवलिंग का ध्यान करते हुए दिखाया गया है. अत: शिव और शंकर 2 अलग-अलग सत्ताएं है. माना जाता है कि महेश यानि की नंदी और महाकाल भगवान शंकर के द्वारपाल हैं. रुद्र देवता शंकर की पंचायत के सदस्य हैं. इस तरह से शिव के अलग अलग अस्तित्व बताएं जाते है.

 

  1. हर काल में शिव

भगवान शिव ने हर काल में लोगों को दर्शन दिए हैं, वे सतयुग में समुद्र मंथन के समय भी थे और त्रेता के राम के समय भी. द्वापर युग की महाभारत काल में भी शिव थे और कलिकाल में विक्रमादित्य के काल में भी शिव के दर्शन होने का उल्लेख मिलता है. भविष्य पुराण के अनुसार राजा हर्षवर्धन को भगवान शिव ने मरुभूमि पर दर्शन दिए थे. कलियुग में भगवान शिव के दर्शन का उल्लेख भविष्य पुराण में बताया गया है, लेकिन कहीं भी इसका उल्लेख किया नहीं जाता हैं.

 

  1. वनवासी और आदिवासियों के देवता?

भारत के असुर, दानव, राक्षस, गंधर्व, यक्ष, आदिवासी और सभी वनवासियों के आराध्य देव शिव ही हैं, कहा जाता है कि शैव धर्म भारत के आदिवासियों का धर्म है. सभी दसनामी, शाक्त, सिद्ध, दिगंबर, नाथ, लिंगायत, तमिल शैव, कालमुख शैव, कश्मीरी शैव, वीरशैव, नाग, लकुलीश, पाशुपात, कापालिक, कालदमन और महेश्वर सभी शैव धर्म से जुड़े हुए हैं. चंद्रवंशी, सूर्यवंशी, अग्निवंशी और नागवंशी भी शिव की ही परंपरा से ही माने जाते है।

Sankashti Chaturthi 2022: Day, date, time, rituals and significance

संकष्टी चतुर्थी 2022 -

साल में आने वाली संकष्टी चतुर्थी और विनायक चतुर्थी का महत्व सनातन धर्म में अत्यधिक माना जाता है, क्योंकि दोनों चतुर्थी पर गणेश जी की पूजा का विधान है.. हर माह में दो चतुर्थी आती है, एक संकष्टी चतुर्थी जो कृष्ण पक्ष की चतुर्थी पर आती है और दूसरी विनायक चतुर्थी जो शुक्ल पक्ष की चतुर्थी पर आती है.. भगवान गणेश की विधि-विधान से पूजा – अर्चना करने पर उनकी विशेष कृपा प्राप्त होती है, साथ ही व्यक्ति की सभी मनोकामना निर्विघ्न पूर्ण होते है.. बप्पा भक्तों की भक्ति से प्रसन्न होकर उनके सभी संकट दूर कर देते हैं. नवंबर माह में संकष्टी चतुर्थी का व्रत 12 नवंबर को रखा जाएगा.

9 नवंबर, दिन बुधवार के दिन से मार्गशीर्ष माह की शुरुआत होगी और इसी माह की 12 तारीख को संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा जाएगा. आइए जानते हैं संकष्टी चतुर्थी की तिथि, शुभ मुहूर्त और मंत्र जाप आदि के बारे में.

 

संकष्टी चतुर्थी शुभ मुहूर्त 2022  

संकष्टी चतुर्थी के व्रत का पारण चंद्रोदय के बाद चंद्र दर्शन और पूजा के बाद ही किया जाता है. बता दें कि चतुर्थी तिथि का आरंभ 11 नवंबर 2022 रात 08 बजकर 17 मिनट से शुरू होकर 12 नवंबर 2022 रात 10 बजकर 25 मिनट तक होगा. इस दिन चंद्रोदय का समय रात 8 बजकर 21 मिनट बताया जा रहा है.

 

संकष्टी चतुर्थी का महत्व

शास्त्रों के अनुसार गणेश जी की कृपा पाने के लिए संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा जाता है. इस दिन विधि-विधान से पूजन किया जाता है. मार्गशीर्ष माह की संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं. इस दिन मंदिर में जाकर गणेश जी की पूजा की जाती है. कहते हैं कि पूजा के दौरान गणेश जी को मोदक का भोग लगाया जाता है. इससे वे जल्द प्रसन्न होकर भक्तों पर कृपा बरसाते हैं और उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं.

Know when is Saubhagya Sundari fast?

सौभाग्य सुंदरी व्रत 2022 -

मार्गशीर्ष माह की कृष्णपक्ष की तृतीया तिथि के दिन सौभाग्य सुंदरी व्रत एवं पूजन किया जाता हैं.. इस दिन सम्पूर्ण परिवार शिव परिवार की पूजा करता है.. सौभाग्य सुंदरी व्रत का पालन अविवाहित लड़कियां और सुहागिन स्त्रियां दोनों करती हैं.. इस व्रत के द्वारा वो देवी पार्वती से अखंड सुहाग और योग्य संतान की कामना करती हैं..

 

सौभाग्य सुंदरी व्रत तिथि

वर्ष 2022 में सौभाग्य सुंदरी व्रत एवं पूजन 11 नवंबर 2022, दिन शुक्रवार को किया जाएगा

 

सौभाग्य सुंदरी व्रत का महत्व

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सौभाग्य सुंदरी व्रत एवं पूजन करने से सौभाग्यवती स्त्री को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है.. इस दिन भगवान गणेश, देवी पार्वती, भगवान शिव और भगवान कार्तिकेय का पूजन किया जाता है.. यह व्रत पति और संतान के लिए किया जाता हैं.. इस दिन स्त्रियां सोलह श्रृंगार करती हैं और अपने पति की लंबी आयु के लिए देवी पार्वती से प्रार्थना करती है..

 

सौभाग्य सुंदरी व्रत करने का फल

  • सुहागिन स्त्रियों को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती हैं, उनके पति की आयु लंबी होती है.
  • अविवाहित लड़कियों को मनचाहा जीवनसाथी प्राप्त होता हैं.
  • उत्तम और योग्य संतान की प्राप्ति होती हैं
  • संतान सुरक्षित रहती हैं
  • दाम्पत्य सुख में वृद्धि होती हैं
  • पारिवारिक कलह समाप्त होता हैं
  • पति-पत्नी में प्रेम बढ़ता है
  • जन्मपत्री में यदि मांगलिक दोष हो तो इस व्रत के पालन से उसकी शांति होती है
  • धन – समृद्धि में वृद्धि होती हैं
  • विवाह में आने वाली अड़चने स्वत: दूर हो जाती हैं
  • यदि किसी स्त्री की कुंडली में विवाह से जुड़ा कोई अशुभ योग हो जैसे – वैवाहिक सुख का अभाव या विवाह विच्छेद या अलगाव, तो उसे इस व्रत का विधि-विधान से पालन करना चाहिए.. इस व्रत के प्रभाव से वैवाहिक जीवन से जुड़े सभी अशुभ योगों का निवारण हो सकता हैं.

Apart from Shri Ram, Ravana was defeated by these too?

Shri Ram And Ravan Story -

अधिकतर लोग यही जानते हैं कि रावण सिर्फ श्रीराम से ही हारा था, लेकिन ये सच नहीं है। रावण श्रीराम के अलावा शिवजी, राजा बलि, बालि और सहस्त्रबाहु से भी पराजित हो चुका था, जिसके बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी प्राप्त है. श्रीराम रावण की मृत्यु का कारण थे, इसलिए इन लोगों ने केवल रावण को पराजित किया था, वध नहीं किया था। इस कहानी के द्वारा जानिए इन चारों से रावण कब और कैसे हारा था।

 

बालि से रावण की हार

एक बार रावण, बालि से युद्ध करने के लिए पहुंचा। बालि उस समय यज्ञ कर रहा था। रावण बार-बार बालि को ललकार रहा था, जिससे बालि के यज्ञ में बाधा उत्पन्न हो रही थी. जब रावण नहीं माना तो बालि ने उसे अपनी बाजू में दबा कर चार समुद्रों की परिक्रमा की थी. बालि बहुत शक्तिशाली था और इतनी तेज गति से चलता था कि रोज सुबह-सुबह ही चारों समुद्रों की परिक्रमा कर लेता था. इस प्रकार परिक्रमा करने के बाद सूर्य को अर्घ्य अर्पित करता था. जब तक बालि ने परिक्रमा की और सूर्य को अर्घ्य अर्पित किया तब तक रावण को अपने बाजू में दबाकर ही रखा था. रावण ने बहुत प्रयास किया, लेकिन वह बालि की गिरफ्त से आजाद नहीं हो पाया. जब बालि का यज्ञ पूर्ण रूप से सफल हुआ तब बालि ने रावण को मुक्त किया. रावण ने बालि से क्षमा मांग कर, गलती को स्वीकारा और वहां से चला गया.

 

सहस्त्रबाहु अर्जुन से रावण की हार

सहस्त्रबाहु अर्जुन के एक हजार हाथ थे और इसी वजह से उसका नाम सहस्त्रबाहु पड़ा था. जब रावण सहस्त्रबाहु से युद्ध करने पहुंचा तो सहस्त्रबाहु ने अपने हजार हाथों से नर्मदा नदी के बहाव को रोक दिया था. सहस्त्रबाहु ने नर्मदा का पानी इकट्ठा किया और पानी छोड़ दिया, जिससे रावण अपनी पूरी सेना के साथ ही नर्मदा में बह गया था. इस पराजय के बाद एक बार फिर रावण सहस्त्रबाहु से युद्ध करने पहुंच गया था, तब सहस्त्रबाहु ने उसे बंदी बनाकर जेल में डाल दिया था. काफी प्रयास के बाद भी रावण सहस्त्रबाहु से जीत नहीं पाया और अपनी हार स्वीकार कर, क्षमा मांग कर जेल से मुक्त हुआ.

 

राजा बलि के महल में रावण की हार

दैत्यराज बलि पाताल लोक के राजा थे. एक बार रावण राजा बलि से युद्ध करने के लिए पाताल लोक में उनके महल तक पहुंच गया था. वहां पहुंचकर रावण ने बलि को युद्ध के लिए ललकारा, उस समय बलि के महल में खेल रहे बच्चों ने ही रावण को पकड़कर घोड़ों के साथ अस्तबल में बांध दिया था. इस प्रकार राजा बलि के महल में रावण की हार हुई.

 

शिवजी से रावण की हार

रावण बहुत शक्तिशाली था और उसे अपनी शक्ति पर बहुत ही घमंड भी था. रावण इस घमंड के नशे में शिवजी को हराने के लिए कैलाश पर्वत पर पहुंच गया था. रावण ने शिवजी को युद्ध के लिए ललकारा, लेकिन महादेव तो ध्यान में लीन थे. रावण कैलाश पर्वत को उठाने लगा. तब शिवजी ने पैर के अंगूठे से ही कैलाश का भार बढ़ा दिया, इस भार को रावण उठा नहीं सका और उसका हाथ पर्वत के नीचे दब गया. बहुत प्रयत्न के बाद भी रावण अपना हाथ वहां से नहीं निकाल सका. तब रावण ने शिवजी को प्रसन्न करने के लिए उसी समय शिव तांडव स्रोत रच दिया. शिवजी इस स्रोत से बहुत प्रसन्न हो गए और उसने रावण को मुक्त कर दिया. मुक्त होने के पश्चात रावण ने शिवजी को अपना गुरु बना लिया.