क्या है भस्म आरती?

मध्यप्रदेश के उज्जयिनी के श्री महाकालेश्वर भारत में बारह प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंगों में से एक हैं.. महाकालेश्वर मंदिर की महिमा का विभिन्न पुराणों में विशद वर्णन किया गया है.. कालिदास से शुरू करते हुए, कई संस्कृत कवियों ने इस मंदिर को भावनात्मक रूप से समृद्ध किया है.. उज्जैन भारतीय समय की गणना के लिए केंद्रीय बिंदु हुआ करता था और महाकाल को उज्जैन का विशिष्ट पीठासीन देवता माना जाता था.. समय के देवता, शिव अपने सभी वैभव में, उज्जैन में शाश्वत शासन करते हैं। महाकालेश्वर का मंदिर, इसका शिखर आसमान में चढ़ता है, आकाश के खिलाफ एक भव्य अग्रभाग, अपनी भव्यता के साथ आदिकालीन विस्मय और श्रद्धा को उजागर करता है.. भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक, महाकाल में लिंगम (स्वयं से पैदा हुआ), स्वयं के भीतर से शक्ति को प्राप्त करने के लिए माना जाता है.. महाकालेश्वर की मूर्ति दक्षिणमुखी होने के कारण दक्षिणामूर्ति मानी जाती है.. यह एक अनूठी विशेषता है, जिसे तांत्रिक परंपरा द्वारा केवल 12 ज्योतिर्लिंगों में से महाकालेश्वर में पाया जाता है.. महाकाल मंदिर के ऊपर गर्भगृह में ओंकारेश्वर शिव की मूर्ति प्रतिष्ठित है.. गर्भगृह के पश्चिम, उत्तर और पूर्व में गणेश, पार्वती और कार्तिकेय जी के चित्र स्थापित हैं.. दक्षिण में नंदी की प्रतिमा है, तीसरी मंजिल पर नागचंद्रेश्वर की मूर्ति केवल नागपंचमी के दिन दर्शन के लिए खुली होती है.. महाशिवरात्रि के दिन, मंदिर के पास एक विशाल मेला लगता है, और रात में पूजा होती है।

 

महाकाल मंदिर के विशेष उत्सव एवं पर्व

यूं तो महाकाल मंदिर में वर्षभर उत्सव का ही माहौल रहता है, लेकिन विशेष अवसरों पर यहां विशेष उत्सवों का आयोजन होता है.. श्रावण मास के प्रत्येक सोमवार को राजाधिराज महाकाल की विशेष सवारी निकलती है, जब महाकालेश्वर नगर भ्रमण कर नगरवासियों को दर्शन देते है.. वैकुंठ चतुर्दशी पर हरिहर मिलन सवारी यानि हरि विष्णु और हर शिव का मिलन होता है.. फाल्गुन कृष्ण पंचमी या षष्ठी से महाशिव रात्रि तक शिव नवरात्रि के दौरान भगवान शिव का विशेष श्रृंगार किया जाता है.. महाशिवरात्रि के दिन विशेष उत्सव होते हैं..

 

महाकाल मंदिर परिसर में स्थित अन्य मंदिर

महाकालेश्वर मंमिदर परिसर में और भी ऐसे मंदिर तथा देव प्रतिमाएं हैं, जो श्रद्धालुओं की आस्था का केन्द्र हैं.. इनमें लक्ष्मी-नृसिंह मंदिर, ऋद्धि-सिद्धि गणेश, विट्ठल पंढरीनाथ मंदिर, श्रीराम दरबार मंदिर, अवंतिका देवी, चंद्रादित्येश्र्वर, मंगलनाथ, अन्नपूर्णादेवी, वाच्छायन गण्पति, औंकारेश्वर महादेव, नागचंद्रेश्वर महादेव, नागचंद्रेश्वर महादेव, त्रिविष्टापेश्वर महादेव, मां भद्रकाली मंदिर, नवग्रह मंदिर, मारुतिनंदन हनुमान, कोटितीर्थ कुंड, श्रीराम मंदिर, नीलकंठेश्वर महादेव, गोविंदेश्वर महादेव, सूर्यमुखी हनुमान, लक्ष्मीप्रदाता मोढ़ गणेश मंदिर, स्वर्णजालेश्वर महादेव, शनि मंदिर, कोटेश्वर महादेव, अनादिकल्पेश्वर महादेव, चंद्र-आदित्येश्र्वर महादेव, वृद्धकालेश्वर महादेव, सप्तऋषि मंदिर, श्री बालविजय मस्त हनुमान आदि प्रमुख है..

 

कुंड में नहाने से दूर होते हैं पाप

मंदिर के पास एक कुंड है, ऐसा माना जाता है की इसमें नहाने से सभी पाप धुल जाते हैं.. मान्यताओं के मुताबित उज्जैन महाकाल के प्रकट होने से जुड़ी एक कथा है, जिसमें दूषण नामक असुर से प्रांत के लोगों की रक्षा के लिए महाकाल यहां प्रकट हुए थे, फिर जब दूषण का वध करने के बाद भक्तों ने शिवजी से उज्जैन में ही रहने की प्रार्थना की तो भगवान शिव महाकाल ज्योतिर्लिंगों के रूप में प्रकट हुए..

 

सिर्फ महाकाल में देखने मिलती है भस्म आरती

उज्जैन को प्राचीनकाल से धार्मिक नगरी कहा गया है.. आज भी यहां दूर दूर से लोग दर्शन करने के लिए आते हैं.. भगवान महाकाल की भस्म आरती के दुर्लभ पलों को देखने का अवसर आपको यहां ही मिलेगा.. माना जाता है कि इस आरती को देखने मात्र से ही लोगों के कष्ट दीर होते हैं, इसके बिना आपके दर्शन पूरे भी नहीं होते हैं..

 

क्या है भस्म आरती?

भस्म को सृष्टि का सार माना जाता है, ऐसे में भगवान शिव इसे हमेशा धारण किए रहते हैं.. हर सुबह महाकाल की भस्म आरती से श्रृंगार किया जाता है और उन्हें जगाया जाता है.. सालों पहले की बात करें तो शमशान से भस्म लाने की परंपरा थी, हालांकि पिछले कुछ सालों में अब कपिला गाय के गोबर से बने कंडे, शमी, पीपल, पलाश, बड़, अमलतास और बेर की लकड़ियों को जलाकर भस्म को तैयार किया जाता है, फिर इसे कपड़े से छानने के बाद इस्तेमाल किया जाता है.. भस्म आरती के पीछे मान्यता है कि भगवान शिव श्मान के साधक हैं, इस कारण से भस्म को उनका श्रृंगार माना जाता है.. इसी के साथ कहते हैं कि ज्योतिर्लिंग पर चढ़े भस्म का प्रसाद खाने से रोग दोष से मुक्ति मिलती है..

 

क्या हैं नियम?

नियमों के मुताबिक, महिलाओं को आरती के समय घूंघट करना होता है, क्योंकि महिलाएं इस आरती को नहीं देख सकती हैं, इसके अलावा आरती के दौरान पुजारी भी मात्र एक धोती में आरती करते हैं.. दूसरे किसी भी तरह के कपड़ों को पहनने की मनाही है..     

 

कैसे पहुंचे उज्जैन महाकालेश्वर?

महाकाल दर्शन के लिए आपके पास तीन यातायात हैं। इन साधनों से आप उज्जैन पहुंच सकते हैं।

 

ट्रेन- उज्जैन सभी बड़े शहरों के रेलमार्ग से जुड़ा है। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता जैसे शहरों से यहां के लिए सीधी ट्रेन है।

 

एयरप्लेन- उज्जैन में एयरपोर्ट नहीं है लेकिन इसके सबसे नजदीकी एयरपोर्ट की बात करें तो इंदौर है। इंदौर से उज्जैन करीब 58 किलोमीटर है। एयरपोर्ट से उतरते ही आपको टैक्सी या बस मिलेंगी। यहां से महाकालेश्वर पहुंचने के लिए करीब 1 से 1.15 घंटे लगेंगे।

 

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की पौराणिक कथा

अवंती नाम से एक रमणीय नगरी हुआ करती थी, जो भगवान शिव को बहुत प्रिय थी.. इसी नगर में एक ज्ञानी ब्राह्मण रहते थे, जो बहुत ही बुद्धिमान और कर्मकांडी ब्राह्मण थे.. साथ ही ब्राह्मण शिव के बहुत बड़े भक्त थे.. वह हर रोज पार्थिव शिवलिंग बनाकर उसकी आराधना किया करते थे.. ब्राह्मण का नाम वेद प्रिय था, जो हमेशा वेद के ज्ञान अर्जित करने में लगे रहते थे.. ब्राह्मण को उनके कर्मों का पूरा फल प्राप्त हुआ था..

 

तो वहीं दूसरी ओर रत्नमाल पर्वत पर दूषण नामक राक्षस रहता था.. इस राक्षस को ब्रह्मा जी से एक वरदान प्राप्त था, इसी वरदान के मद में वह धार्मिक व्यक्तियों पर आक्रमण किया करता था.. उसने उज्जैन के ब्राह्मणों पर आक्रमण करने का विचार बना लिया, इसी वजह से उसने अवंती नगर के ब्राह्मणों को अपनी दुष्टता से परेशान करना शुरू कर दिया.. राक्षस ब्राह्मणों को कर्मकांड करने से रोकने लगा.. राक्षस चाहता था कि सभी ब्राह्मण धर्म-कर्म का कार्य करे, लेकिन ब्राह्मणों ने उसकी इस बात को अंदेखा किया.. इसके बाद राक्षसों द्वारा उन्हें आए दिन परेशान किया जाने लगा.. राक्षसों से परेशान होकर ब्राह्मणों ने शिव शंकर से अपने रक्षा के लिए प्रार्थना की..

 

ब्राह्मणों के विनय पर भगवान शिव ने राक्षस के अत्याचार को रोकने से पहले उन्हें चेतावनी दी..  भगवान शिव की बात ना मान कर राक्षसों ने ब्राह्मणों पर हमला कर दिया.. भगवान शिव धरती फाड़कर महाकाल के रूप में प्रकट हुए.. नाराज शिव ने अपनी एक हुंकार से ही दूषण राक्षस को भस्म कर दिया और राक्षसों के अत्याचार से मुक्ति दिलाई.. भक्तों की इच्छा थी, कि भगवान शिव उसी रूप में वहीं बस जाएं.. इस मांग से अभीभूत होकर भगवान वहां विराजमान हो गए.. इसी वजह से इस जगह का नाम महाकालेश्वर पड़ा, जिसे आप महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के नाम से जानते हैं..